Friday, June 7, 2013

उठती है लहर

लहरा रही है
एक छोटी तरंग
सतह पर
उठती है कभी
अचकचा कर
धैर्य के साथ
यह जानते हुवे भी
कि धकेल दी जाएगी पुनः
उमड़ते हुए सागर की
सपाट सतह पर !

फ़िर भी
उठती है लहर
सागर के पौरुष पर
अक्षरबद्ध कविता सी
अपनी लय में !
***

5 comments:

  1. Facebook पर वायरस, डाल सकता है आपके बैंक एकाउंट पर डाका

    http://hinditech4u.blogspot.in/2013/06/facebook.html

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  2. बहुत सुन्दर विचार हैं लहरों की व्यथा के। उत्तर में अपनी कविता की कुछ अंतिम पंक्तियाँ प्रस्तुत कर रही हूँ। "जैसे कोई ठहरे पानी में फेंक कंकरी लहरों का प्रलाप
    देखे
    ।..... बीतती तो उस पानी पर है जिस पर लगती है कंकरी...
    धन्यवाद।

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